हर साल सर्दियों की आहट के साथ ही उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की हवा का जहरीला होना एक वार्षिक त्रासदी बन चुका है। हाल ही में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के 'बहुत खराब' श्रेणी में पहुंचने के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) द्वारा 'ग्रेप-2' (GRAP-2) का लागू किया जाना और दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिवाली के अवसर पर केवल 'ग्रीन पटाखों' को तय समय के लिए सशर्त अनुमति देना यह रेखांकित करता है कि हमारी न्यायपालिका और प्रशासन इस समस्या से निपटने के लिए कितने गंभीर हैं। इसके साथ ही, दक्षिण भारत में चक्रवाती तूफानों और मौसम के अचानक बदलते मिजाज ने यह साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की एक भयावह वास्तविकता है।
तथापि, विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या डीजल जनरेटर पर रोक लगाने, पार्किंग शुल्क दोगुना करने, सड़कों पर पानी का छिड़काव करने और कुछ दिनों के लिए पुराने वाहनों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने भर से इस विकट समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है? पिछले कई वर्षों के अनुभवों से यह स्पष्ट हो चुका है कि ये तमाम उपाय केवल 'आपातकालीन बैंडेज' की तरह काम करते हैं। जब तक जनसामान्य के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह से सुगम, सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल (इलेक्ट्रिक बसें व मेट्रो का विस्तार) नहीं बनाया जाता, तब तक लोगों को निजी वाहनों के प्रयोग से पूरी तरह नहीं रोका जा सकता।
इसके अतिरिक्त, हाल ही में ओमान तट के पास भारतीय मालवाहक जहाज पर हुए हमले जैसी अंतरराष्ट्रीय और सामरिक घटनाएं भी यह चेतावनी देती हैं कि भारत की सुरक्षा और आर्थिक नीतियां केवल घरेलू सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल से भी सीधे जुड़ी हुई हैं। चाहे वह समुद्री व्यापार की सुरक्षा हो या घरेलू मोर्चे पर चक्रवातों और प्रदूषण से निपटना हो, हर जगह 'एकीकृत और पूर्व-सक्रिय दृष्टिकोण' (Proactive Approach) की आवश्यकता है।
पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों के मामले में अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपनी राजनीतिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर एक समन्वित और दीर्घकालिक रोडमैप तैयार करें। केवल अदालतों के आदेशों के डर से या सीजन विशेष में कागजी फरमान जारी कर देने से हवा शुद्ध नहीं होगी। जब तक खेतों से लेकर कारखानों और सड़कों तक शून्य-सहिष्णुता (Zero-tolerance) की नीति को कड़ाई से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक देश की जनता इसी तरह कृत्रिम धुंध और प्रशासनिक औपचारिकताओं के बीच घुटने को विवश रहेगी।